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गोलमेज़ सम्मेलन : गांधी जी , अम्बेडकर और === भारत के आंदोलन की दिशा |UPSC & STATE PCS SPECIALLY and All Oneday Exam

गोलमेज़ सम्मेलन : गांधी जी , अम्बेडकर और 
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भारत के आंदोलन की दिशा 
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भारतीय आंदोलन में गोलमेज़ सम्मेलन का एक एतिहासिक परिप्रेक्ष्य है । अंग्रेज़ी सरकार भारतीय नेताओं और आंदोलनकारियों से पहली बार बराबरी की हैसियत देकर बात की और भारतीय विमर्श को संवाद के माध्यम से लंदन में समझने का प्रयास किया । ये एक भ्रामक व्याख्या है कि मेज़ गोल था इसीलिए गोलमेज़ को गोलमेज़ सम्मेलन समझा गया । वह गोलाकार मेज़ जिसके चारों ओर बैठकर समस्या पर न्यायोचित रूप से विचार-विमर्श किया जाय । जोकि श्रेष्ठता के भाव को दरकिनार कर विवाद को सुलझाने पर बल देता है ।
भारत की भावी शासन-प्रणाली व संविधान के बारे में रूप-रेखा तय करने के उद्देश्य से ब्रिटिश सम्राट ने साइमन कमीशन की सिफारिश पर गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया । यह सम्मेलन लंदन में 12 नवंबर 1930 को शुरू हुआ | इस सम्मेलन से ब्रिटिश सरकार और भारतवासियों के 89 प्रतिनिधियों ने भाग लिया । डॉ. अंबेडकर ने इसमें अछूत लोगो के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया । यह एक ऐसा समागम था, जिसमें मुख्य विषयों पर अपने विचार प्रकट करने थे और वे नोट किए जाने थे ।
डाँ. अंबेडकर ने अपनी प्रभावशाली आवाज से अपने भाषण के शुरू में ही कहा कि “वह ब्रिटिश-भारत की जनसंख्या के पाँचवे भाग का, जो कि इग्लैंड या आयरलैंड और स्कॉटलैंड की जनसंख्या से भी अधिक है, दृष्टिकोण प्रस्तुत कर रहे हैं । इन लोगों की दशा पशुओं से भी गई-गुजरी है ।” डॉ. अम्बेडकर ने मज़बूत स्वर के साथ कहा, “जब हम अपनी वर्तमान स्थिति और ब्रिटिश शासन से पहले की स्थिति की तुलना करते है, तो हम देखते है कि हम उन्नति करने के बजाय  व्यर्थ समय काट रहे है ।”भारत में ब्रिटिश शासन से पहले छुआछूत के कारण हमारी दशा घृणापूर्ण थी। क्या ब्रिटिश सरकार ने इसे दूर करने के लिए कुछ किया, ब्रिटिश सरकार से पहले हम कुओं से पानी नहीं भर सकते थे, क्या ब्रिटिश सरकार ने हमें पानी भरने का अधिकार प्राप्त करवा दिया? ब्रिटिश सरकार से पहले हम मंदिरो से प्रवेश नहीं कर सकते थे, क्या अब हम प्रवेश कर सकते है ? ब्रिटिश सरकार से पहल हमें पुलिस में भर्ती नहीँ किया जाता था, क्या अब हमारे लिए पुलिस या सेना भर्ती के द्वार खुले हैं? इन सभी प्रश्नों का उतर हां में नहीं दिया जा सकता। पराकाष्ठाओं के घाव हमेशा रिसते रहते है । हालांकि ब्रिटेन के शासन को 150 से अधिक समय बीत चुका है । ऐसी सरकार का किसी को क्या लाभ?

डा. अंबेडकर ने मांग की कि दलित वर्गो को दूसरे नागरिकों के समान नागरिक अधिकार दिए जाएं, कानून में प्रत्येक प्रकार का भेदभाव व उच्च-नीच एकदम समाप्त किए जाएं। दलित वर्गो को विधानसभाओं में अपने प्रतिनिधि अपने लोगों द्धारा स्वयं चुनने की छूट हो और दलित वर्गो को सरकारी नौकरियों में पूर्ण प्रतिनिधितव दिया जाए और कर्मचारियों की भर्ती और नियन्त्रण के लिए सार्वजनिक सेवा आयोग स्थापित किए जाएं |
 
जिस निर्भयता से डॉ. अंबेडकर गरजे, जिस विद्वतापूर्ण ढंग” के साथ उन्होंने सरकार की आलोचना की और जिस दर्द भरी आवाज के साथ उन्होंने भारत के करोडों गरीबों की, लाचारो की दुर्दशा का वर्णन किया, इससे पूरे सम्मेलन मे सबसे अधिक प्रसन्न थे महाराजा बड़ोदा, जिन्होंने बाबा साहब को शिक्षा प्राप्त करने के लिए आर्थिक सहायता दी थी । वे तो फूले नहीं समाते थे।
 
इंग्लेंड के समाचार पत्रों पर भी डॉ. अंबेडकर के भाषण का बहुत प्रभाव पड़ा । “दि इंडियन डेली मेल’ ने तो यहा तक प्रशंसा की कि समूची सम्मेलन मे डॉ. अंबेडकर का भाषण सर्वोत्तम भाषण था | भाषण का तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री मिस्टर रैमजे मैकडोनाल्ड पर भी अच्छा प्रभाव पडा । समाचार पत्रों और राजनीतिज्ञों ने दलित वर्ग और डा. अंबेडकर की ओर अधिक ध्यान देना शुरू कर दिया ।
 
डा. अंबेडकर ने इस गोलमेज कांफ्रेस की अवधि के दौरान लन्दन में रहते हुए मौके का भरपूर सदुपयोग किया । उन्होंने समाचार पत्रों को लेख भेजे, सभाएं की व प्रमुख ब्रिटिश नेताओं से मिले । बाबा साहब के कठोर परिश्रम का फल यह निकला कि समस्त विश्व को ज्ञात हुआ कि भारत के अछूतों की दशा वास्तव में बहुत चिंतनीय है । कई अंग्रेज नेताओ का ह्रदय भी पिघल गया । लॉर्ड सेंकी ने वायदा किया कि दलित वर्गो को भारत के अन्य निवासियों के समान रखा जाएगा ।
 
गोलमेज सम्मेलन मे डा. आंबेडकर ने जो भाषण दिए व अपनी मांगें रखीं, भारत मे उनकी प्रतिक्रिया होने लगी । पुलिस विभाग ने दलित वर्गों के लिए भर्ती खोल दी । डॉ. अंबेडकर अब पहले से भी अधिक शक्तिशाली होकर उभरे ।
 
5 नवंबर 1931 को सम्राट ने गोलमेज परिषद के सदस्यों के सम्मान में एक भोज का आयोजन किया । इस भोज में डॉ. अंबेडकर ने भारत के अछूत लोगो की दशा का ऐसा चित्र खींचा कि बहुतों की आँखो में आँसू आ गये । सम्राट ने डा. आंबेडकर से प्रभावित होकर उनके परिवार के बारे में पूछा । उन्होंने उच्च शिक्षा कहां और किस प्रकार प्राप्त की तथा इस पडाव तक वह किस प्रकार पहुंचे, ऐसे कई प्रश्न पूछे । सम्राट डॉ. अंबेडकर के विद्धतापूर्ण वक्तव्यों से बहुत प्रभावित हुए। 

दिल्ली समझौते के प्रावधान के अंतर्गत कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में गांधीजी, द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिये 29 अगस्त 1931 को लंदन रवाना हुये। 7 सितम्बर 1931 से 1 दिसम्बर 1931 तक चले इस सम्मेलन में गांधीजी के ‘राजपूताना’ नामक जहाज में महादेव देसाई, मदनमोहन मालवीय, देवदास गांधी, घनश्यामदास बिड़ला एंव मीरा बेन भी थीं। यद्यपि इस गोलमेज सम्मेलन से गांधीजी को कुछ विशेष प्राप्त होने की उम्मीद नहीं थी क्योंकि
ब्रिटेन में चर्चिल के नेतृत्व में दक्षिण पंथी खेमे ने ब्रिटिश सरकार द्वारा  कांग्रेस को बराबरी का दर्जा देकर बात करने का तीव्र विरोध किया। उसने भारत में और सुदृढ़ ब्रिटिश शासन का माग की। ब्रिटन में रैम्जे मैक्डोनाल्ड के नेतृत्व में बनी लेबर पार्टी में रूढ़िवादी सदस्यों का बोलबाला था तथा इसी समय सेमुअल होअर को भारत का गृहसचिव नियुक्त किया गया, जो कि घोर दक्षिणपंथी था।
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में मुख्यतया रूढ़िवादी, प्रतिक्रियावादी, साम्प्रदायिक एवं ब्रिटिश राजभक्तों के प्रतिनिधि थे, जिनका उपयोग साम्राज्यवादी सरकार ने यह प्रदर्शित करने के लिये किया कि कांग्रेस सभी भारतीयों की एकमात्र प्रतिनिधि संस्था नहीं है। साथ ही सरकार का मकसद था कि हर मोर्चे पर गांधी जी को परास्त किया जाये।
अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर शीघ्र ही सम्मेलन में गतिरोध पैदा हो गया। मुसलमानों, ईसाईयों, आंग्ल-भारतीयों एवं दलितों ने पृथक प्रतिनिधित्व की मांग प्रारंभ कर दी। ये सभी आपस में मिलकर ‘अल्पसंख्यक गठजोड़’ के रूप में संगठित हो गये। किंतु गांधीजी ने साम्प्रदायिक आधार पर किसी भी संवैधानिक प्रस्ताव का अंत तक विरोध किया।
भारतीय रजवाड़े भी संघ बनाने के मुद्दे पर ज्यादा उत्साहित नहीं थे। मुख्यतः उस स्थिति में जब सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित कर कांग्रेस, केंद्र में सरकार का गठन करे।
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन, रेम्जे मैकडोनाल्ड की इस घोषणा के साथ संपन्न हुआ-

दो मुस्लिम प्रांतों-उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत एवं सिंध का गठन।
भारतीय सलाहकारी परिषद की स्थापना।
तीन विशेषज्ञ समितियों- वित्त, मताधिकार एवं राज्यों संबंधी समितियों का गठनI तथा
यदि भारतीयों में सहमति नहीं हो सकी तो सर्वसम्मत साम्प्रदायिक निर्णय की घोषणा।
सम्मेलन में सरकार भारतीयों की मुख्य मांग ‘स्वतंत्रता’ पर किसी भी प्रकार का विचार करने में असफल रही। 28 दिसम्बर 1931 को गांधीजी भारत लौट आये। 29 दिसम्बर 1929 को कांग्रेस कार्यकारिणी ने सविनय अवज्ञा आदोलन फिर से प्रारंभ करने का निर्णय लिया।

इस काल में भी विभिन्न गतिविधियों ने भारतीयों में साम्राज्यवादी शासन के विरुद्ध संघर्ष की भावना को जीवित रखा। संयुक्त प्रांत में कांग्रेस-लगान में कमी करने, बकाया लगान को माफ करने तथा लगान अदा न करने के कारण काश्तकारों को उनकी भूमि से बेदखल  करने की प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग को लेकर प्रारम्भ किये गये आंदोलन को नेतृत्व प्रदान कर रही थी। उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में हुकूमत ने खुदाई खिदमतगार के कार्यकर्ताओं एवं उन किसानों पर कठोर दमनात्मक कार्रवाई की, जो सरकार द्वारा बलपूर्वक लगान वसूल करने का विरोध कर रहे थे। बंगाल में सरकार भेदभावपूर्ण अध्यदेशों के द्वारा शासन चला रही थी तथा आतंकवाद से निबटने के नाम पर उसने हजारों लोगों को कारावास में डाल दिया था। सितम्बर 1931 में हिजली जेल में राजनीतिक बंदियों पर गोली चलाई गयी, जिसमें दो लोगों की मृत्यु हो गयी 

सरकार का परिवर्तित रुखः दिल्ली समझौते से उच्च ब्रिटिश अधिकारियों के सम्मुख यह तथ्य उभरकर सामने आया कि इस समझौते से कांग्रेस की प्रतिष्ठा एवं भारतीयों के उत्साह में वृद्धि हुयी है तथा ब्रिटिश सरकार की प्रतिष्ठा को आघात पहुंचा है। फलतः उन्होंने यथास्थिति को परिवर्तित करने की योजना बनायी। इस योजना के अंतर्गत ब्रिटिश सरकार ने तीन प्रावधानों को अपनाने की रणनीति बनायी-

गांधीजी को पुनः कोई जन-आंदोलन प्रारंभ करने की अनुमति नहीं दी जायेगी।
कांग्रेस की सद्भावना आवश्यक नहीं है। अपितु इसके स्थान पर उन लोगों का सहयोग एवं समर्थन अति आवश्यक है, जिन्होंने कांग्रेस के विरुद्ध हुकूमत का साथ दिया है, उदाहरणार्थ-सरकारी सेवक एवं राजभक्त इत्यादि।
राष्ट्रीय आंदोलन को अब ग्रामीण क्षेत्रों में प्रसारित एवं संगठित होने की अनुमति नहीं दी जायेगी।
कांग्रेस कार्यकारिणी द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन पुनः प्रारंभ किये जाने की घोषणा के पश्चात भारत के नये वायसराय विलिंगडन ने 31 दिसम्बर 1931 को गांधीजी से मिलने से इंकार कर दिया। 4 जनवरी 1932 को गांधीजी को गिरफ्तार कर लिया गया।

4 जनवरी 1932 को गांधीजी की गिरफ्तारी के साथ ही सरकार ने राष्ट्रीय आंदोलन पर पूर्णरुपेण हमला प्रारंभ कर दिया। प्रशासन को असीमित और मनमानी शक्तियां देने वाले अनेक अध्यादेश जारी किये गये तथा ‘नागरिक-सैनिक कानून’ की शुरुआत हो गयी। सभी स्तरों पर कांग्रेस के संगठनों को प्रतिबंधित कर दिया गया, राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जेल में ठूस दिया गया, कांग्रेस से सहानुभूति रखने वाले लोगों को यातनायें दी गयीं, नागरिक अधिकारों को समाप्त कर दिया गया, सम्पत्तियां कुर्क कर ली गयीं तथा गांधीजी के आश्रमों पर जबरदस्ती अधिकार कर लिया गया। अंग्रेजी सरकार के इस दमन का शिकार  महिलायें भी हुयीं। प्रेस के खिलाफ भी कार्रवाई की गयी तथा राष्ट्रवादी साहित्य पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

जनता की प्रतिक्रियाः सरकारी दमन के खिलाफ जनता में तीव्र रोष था। यद्यपि जनता असंगठित तथा अपरिपक्व थी किंतु उसकी प्रतिक्रिया व्यापक थी। केवल प्रथम चार महीनों में ही लगभग 80 हजार सत्याग्रहियों को जेल में डाल दिया गया। इनमें से अधिकांश शहरी और निर्धन ग्रामीण थे। विरोध प्रदर्शन के तरीकों में- शराब की दुकानों पर धरने, विदेशी कपड़ों की दुकानों पर धरने, अवैधानिक सम्मेलन, अहिंसक प्रदर्शन, राष्ट्रीय दिवस का आयोजन, राष्ट्रीय, झंडे का प्रतीकात्मक रोहण, चौकीदारी कर का भुगतान न करना, नमक सत्याग्रह, वन कानूनों का उल्लंघन तथा बम्बई के निकट गुप्त रेडियो ट्रांसमीटर की स्थपाना प्रमुख थे। सविनय अवज्ञा आदोलन के इस चरण में दो भारतीय रियासतों-कश्मीर एवं अलवर में तीव्र जन-प्रतिक्रिया का उभरना आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पहलू था। किंतु इतना होने पर भी यह आंदोलन ज्यादा लंबे समय तक खिंच सका क्योंकि

गांधीजी तथा अन्य राष्ट्रवादी नेता, जन-प्रतिक्रिया को संगठित करने में पर्याप्त समय नहीं दे सके; तथा
जनता असंगठित एवं अपरिपक्व थी।
अंततः अप्रैल 1934 में गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आदोलन वापस लेने का निर्णय लिया। यद्यपि गांधीजी के निर्णय से जनता तथा राजनीतिक कार्यकर्ताओं में थोड़ी निराशा अवश्य हुयी किंतु उनमें कांग्रेस के प्रति निष्ठा कम नहीं हुयी। उन्होंने वास्तविक रूप से न सही दिल से स्वतंत्रता का संघर्ष अवश्य जीत लिया था।

         
            (History)

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