Header Ads Widget

Responsive Advertisement

Ticker

6/recent/ticker-posts

1857 का विद्रोह

                                   1857 का विद्रोह

विद्रोह के कारण

1857 के विद्रोह के स्वरूप और कारणों के बारे में इतिहासकारों में पर्याप्त मतभेद है।  अंग्रेजी और भारतीय विद्वानों में अधिकांश विद्रोह का कारण सैनिकों की शिकायतों और चरबीयुक्त कारतूस को मानते हैं।  

परन्तु आधुनिक खोजों से यह बात करीब करीब सिद्व हो जाती है कि सैनिक असन्तोष के लिए चरबीयुक्त कारतूस तो एक मात्र कारण है न कि सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण।  

     


राजनीतिक कारण

वेलेजली की सहायक संधि और डलहौजी की हडप नीति।  

डलहौजी ने 20 हजार जमींदारों की जमीदारी जब्त कर लिया था।  

न्याय पालीका की भाषा अंग्रेजी की गई थी।  

भारतीयों को सरकारी सेंवाओ के उच्च पदों से दूर रखा गया था। 

 

आर्थिक कारण

अंग्रेजो की भू राजस्व नीति

भारत से धन का निश्काशन।  

जमींदारो पर राजस्व का बोझ

रेलवे का विकास डाक तार का विकास इत्यादि  

सामाजिक धार्मिक कारण

सती प्रथा का अन्त

विधवा पूनः विवाह अधिनियम

नर हत्या शिशु हत्या प्रतिबन्ध

समुन्द्र पार की यात्रायें इत्यादि  


सैनिक कारण  

नसली भेद भाव

भारत के सैनिकों को योग्य होने के बाद भी सुवेदार सें बडे पदों पर नियुक्ति पर रोक थी।  

वेतन और भत्ते की असमानताये और खराब सुविधायें आदि ऐसे कारण थे जिन्होंने भारतीय सैनिकों में असन्तोष को जन्म दिया और वे विद्रोह के लिए विवश हुए।  


तात्कालिक कारण

चर्बी लगे कारतूसों के प्रयोग को 1857 के विद्रोह का तात्कालिक कारण माना जाता है।  


घटनाक्रम



29 मार्च 1857 को बैरकपुर की छावनी में 34वी एन आई रेजीमेंट के जवान मंगल पाण्डेय नामक एक सिपाही ने चर्बी लगे कारतूस के प्रयोग से इंकार करते हुए अपने दो अधिकारी हयूसन और बाग की हत्या कर दी।  

म्ांगल पाण्डेय उत्तर प्रदेश के तात्कालीन गाजीपुर अब बलिया जिले का रहने वाला था।  अंग्रेजो ने 8 अप्रैल 1857 को मंगल पाण्डेय को फांसी दे दी।


विद्रोह का प्रसार 



  10 मई 1857 को मेरठ के 19वीं छावनी इनफैन्टी के जवानों ने विद्रोह कर दिया और दिल्ली के लिए रवाना हो गये।  

11 मई को ये मेरठ के जवान यमुना नदी पार कर जब दिल्ली में प्रवेश किये तो सबसे पहली घटना चुंगी घर को नष्ट कर के अंजाम दिया।  

 राजनीतिक सलाहकार साइमन फ्रेजर मारा गया और कर्नल विलोपी घायल हो गया जिसकी बाद में मृत्यु हो गई ये विद्रोही सैनिक दिल्ली के लालकिले पर पहुचकर बहादुर शाह जफर से नेतृत्व करने की मॉग करने लगें यह कारण है की बहादुर शाह जफर इन विद्रोही सैनिकों का नेतृत्व करना स्वीकार किया और सैनिक नेत्त्व बख्त खान को दिया गया धीरे धीरे यह विद्रोह कई रियासतों में पहुचने लगा।  

दिल्ली विजय का समाचार समूचे देश में फैल गया।  देखते देखते विद्रोह ने अपनी चपेट में कानपुर लखनउ बरेली जगदीशपुर झांसी अलीगढ  रूहेलखण्ड इलाहाबाद ग्वालियर को ले लिया।  

कानपुर में 5 जून 1857 को विद्रोह की शुरूआत हुई।  यहां पर पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब ने विद्रोह का नेतृत्व किया जिसमें उनकी सहायता तांत्याटोपे ने की।  ,

नाना साहब लगातार पराजयों को झेलते हुए अन्ततः नेपाल फरार हो गये वहीं पर 1859 में उनकी मृत्यु हो गयी थी।  

दिल्ली में 82 वर्षीय बहादुरशाह ने बख्त खॉ के सहयोग से विद्रोह को नेतृत्व प्रदान किया 20 सितम्बर 1857 को बहादुरशाह ने हुमायूॅ के मकबरे में अंग्रेज हडसन के समक्ष समर्पण कर दिया।  

बहादुर शाह जफर को हुमॉयू के मकबरे में बन्दी बनाया गया था।  बाद में उन्हें रंगून भेज दिया गया जहॉ 1862 में उनकी मृत्यु हो गयी।  रंगून में स्थित बहादुरशाह की मजार पर लिखा है कि ‘‘जफर इतना बदनसीब है कि उसे अपनी मातृभूमि में दफन के लिए दो गज जमीन भी नसीब न हुई।‘‘

लखनउ में 4 जून 1857 को विद्रोह कि शुरूआत हुई।  बेगम हजरत महल ने अपने अल्पायु पुत्र बिरजिस कादिर को नवाब घोषित किया तथा लखनउ स्थित ब्रिटिश रेजिडेंसी पर आक्रमण किया।  

झॉसी में 4 जून 1858 को रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में विद्रोह कि शुरूआत हुई जिसमें रानी ने अपने साहसी नेतृत्व में अंग्रेजों के साथ वीरतापूर्वक युद्ध किया परन्तु झांसी के पतन के बाद रानी लक्ष्मीबाई ग्वालियर की ओर प्रस्थान कर गयी।  

ग्वालियर में तात्या टोपे के साथ विद्रोह को नेतृत्व प्रदान किया।  अनेक युद्धों में अंग्रेजों को पराजित करने के बाद अंग्रेजी जनरल हयूरोज से लडते हुए 17 जून 1858 को वीरगति को प्राप्त हो गयी।  

रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु पर जनरल हयूरोज ने कहा था ‘‘भारतीय क्रान्तिकारियों में यहॉ सोयी हुई औरत अकेली मर्द है।‘‘  

तांत्याटोपे जिनका वास्तविक नाम ‘रामचन्द्र पांडुरंग‘ था ग्वालियर के पतन के बाद अप्रैल 1859 में नेपाल चले गये जहॉ पर एक जमींदार मित्र मानसिंह के विश्वासघात के कारण पकडे गये तथा 18 अप्रैल 1859 को फांसी पर लटका दिये गये।  

जगदीशपुर आरा बिहार में विद्रोह का झंडा जमींदार कुंवर सिंह ने 1857 में फहराया।  कुवर सिंह 23 मार्च 1858 को शहीद हो गये।  कुंवर सिंह के बाद इनके पुत्र अमर सिंह ने नेतृत्व संभाला था।  

फैजाबाद में 1857 के विद्रोह को मौलवी अहमदुल्ला ने अपना नेतृत्व प्रदान कियां  

मरते हुये विद्रोही सैनिकों ने कहॉ था इस तार ने हमारा गला घोट दिया। 


1857 विद्रोह एक झलक में



वी डी सावरकर  वी डी सावरकर के अनुसार 1857 को विद्रोह प्रथ स्वतंत्रता संग्राम था।  

टी आर होम्ज ने कहा था कि यह सभ्यता और बर्बरता का संर्घष था।  

एल ई आर रीज के अनुसार यह ईसाइ धर्म के विरूद्ध एक धर्म युद्व था।  

ज्वाहर लाल नेहरू के अनुसार यह एक सावन्तवादी प्रतिक्रिया थी।  

आर सी मजुमदार के अनुसार ये ना तो प्रथम न राष्ट््ीय और न ही स्वतंत्रता संग्राम था।  

डिजरायली के अनुसार यह राष्ट्ीय विद्रोह था।  


1857 के विद्रोह के समय भारत का गर्वनर जनरल लार्ड कैनिंग था जबकि ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया थी।  


1957 में नेहरू जी ने 1857 के 100 साल पुरा होने पर इतिहास लेखन का सरकारी दायित्व आर सी मजुम्दार को दिया था।  लेकिन इस इतिहास को एस एन सेन ने लिखा।  


वायसराय कैनिंगा के समय में 1861 का इण्डियन काउसिंल एक्ट 1861 इण्डियन हाईर्कोट एक्ट 1861 का इण्डियन सिविल सर्विस एक्ट पारित किया गया।  



एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ