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बक्सर का युद्ध : कारण, परिणाम और प्लासी से तुलना प्लासी और बक्सर युद्ध की तुलना

 बक्सर का युद्ध : कारण, परिणाम और प्लासी से तुलना 

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फ़तवा-ए-जहाँदारी के लेखक जियाउद्दीन बरनी ने कहा था इतिहास पढ़ना पापों का प्रायश्चित है । ये बात कितनी सत्य है मैं इस संदर्भ में कोई चिरकालिक दावा तो नहीं करता लेकिन किसी राष्ट्र  की आने वाली पीढ़ी तब तक अपने सामर्थपूर्ण भविष्य का निर्माण नहीं कर सकती जब तक वह समाज अपने अतीत की चेतना को गहराई से न समझती हो । आधुनिक भारत के इतिहास में कई करवट बदलने वाली घटनाए हुई है । लेकिन जिस घटना ने भारत में ब्रिटिश सत्ता के वजूद को एक नियंत्रक में बदल दिया वो प्लासी और बक्सर का निर्णायक युद्ध था । आज समय का प्रयोग इसी मुद्दे को समझने में और इसके महत्व को विवेचित करने के लिए  करता हू । बक्सर के युद्ध और अंग्रेजो की सफलता के संदर्भ में मुख्यतः तीन पड़ाव देखे जा सकते है , एक बक्सर के युद्ध का कारण , दूसरा बक्सर के युद्ध का परिणाम और तीसरा महत्व । असल में सबसे जटिल पड़ाव विशेषकर सिविल सेवा में तैयारी कर रहे छात्रों के लिए बक्सर का युद्ध किस तरह महत्व रखता है । उसमें भी प्लासी के साथ तुलना करके ब्रिटिश शासन किस तरह हिंदुस्तान की पूरी सत्ता अपने हाथ में लिए । कुछ इसी उत्तर की ज़रूरत की पूर्ति इस लेखन से की जाएगी ।



प्लासी के युद्ध के बाद सतारुढ़ हुआ मीर जाफ़र अपनी रक्षा तथा पद हेतु ईस्ट इंडिया कंपनी पर निर्भर था। जब तक वो कम्पनी का लाभ पूरा करता रहा तब तक वह पद पर भी बना रहा। उसने खुले हाथो से धन लुटाया, किंतु प्रशासन सम्भाल नही सका, सेना के खर्च, जमींदारों की बगावातो से स्थिति बिगड़ रही थी, लगान वसूली मे गिरावट आ गई थी, कम्पनी के कर्मचारी दस्तक का जम कर दुरूपयोग करने लगे थे वो इसे कुछ रुपयों के लिए बेच देते थे इस से चुंगी बिक्री कर की आमद जाती रही थी बंगाल का खजाना खाली होता जा रहा था।

हाल्वेल ने माना की सारी समस्या की जड़ मीर जाफ़र है। उसी काल में जाफर का बेटा मीरन मर गया जिस से कम्पनी को अवसर मिल गया था और उसने मीर कासिम जो जाफर का दामाद था, को सत्ता दिलवा दी। इस हेतु 27 सितंबर 1760 एक संधि भी हुई जिसमे कासिम ने 5 लाख रूपये ,बर्धमान ,मिदनापुर, चटगांव के जिले तथा सिलहट में चूने के व्यापार में कम्पनी को आधा मालिकाना हक़ भी दे दिए। इसके बाद धमकी मात्र से मीरजाफ़र को सत्ता से हटा दिया गया और मीर कासिम सत्ता मे आ गया। इस घटना को ही 1760  की क्रांति कहते है। बक्सर के युद्ध के लिएपरिस्थितियाँ 1763 ई. से ही आरम्भ हो चुकी थी, किन्तु मुख्य रूप से यह युद्ध 22 अक्तूबर, सन् 1764 ई. में लड़ा गया। ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा बंगाल के नवाब मीर क़ासिम के मध्य कई झड़पें हुईं, जिनमें मीर कासिम पराजित हुआ। अंतिम पराजित करने वाला अंग्रेज़ एडमस था ।इसी पराजय के फलस्वरूप वह भागकर अवध आ गया और शरण ली। मीर कासिम ने यहाँ के नवाब शुजाउद्दौला और मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय के सहयोग से अंग्रेज़ों को बंगाल से बाहर निकालने की योजना बनायी, किन्तु वह इस कार्य में सफल नहीं हो सका।  इस युद्ध में एक ओर मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय, अवध का नवाब शुजाउद्दौला तथा मीर क़ासिम थे, दूसरी ओर अंग्रेज़ी सेना का नेतृत्व उनका कुशल सेनापति 'कैप्टन हेक्टर मुनरो' कर रहा था। दोनों सेनायें बिहार में 'बक्सर' नामक स्थान पर आमने-सामने आ पहुँचीं। 


22 अक्टूबर, 1764 को 'बक्सर का युद्ध' प्रारम्भ हुआ, किन्तु युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व ही अंग्रेज़ों ने अवध के नवाब की सेना से 'असद ख़ाँ', 'साहूमल' (रोहतास का सूबेदार) और जैनुल अबादीन को धन का लालच देकर अलग कर दिया। लगभग तीन घन्टे में ही युद्ध का निर्णय हो गया, जिसकी बाज़ी अंग्रेज़ों के हाथ में रही। शाह आलम द्विताय तुरंत अंग्रेज़ी दल से जा मिला और अंग्रेज़ों के साथ सन्धि कर ली। ऐसा माना जाता है कि, बक्सर के युद्ध का सैनिक एवं राजनीतिक महत्व प्लासी के युद्ध से अधिक है। मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय, बंगाल का नवाब मीर क़ासिम एवं अवध का नवाब शुजाउद्दौला, तीनों अब पूर्ण रूप से कठपुतली शासक हो गये थे। उन्हें अंग्रेज़ी सेना के समक्ष अपने बौनेपन का अहसास हो गया था। थोड़ा बहुत विरोध का स्वर मराठों और सिक्खों मे सुनाई दिया, किन्तु वह भी समाप्त हो गया। निःसन्देह इस युद्ध ने भारतीयों की हथेली पर दासता शब्द लिख दिया, जिसे स्वतन्त्रता प्राप्त करने के बाद ही मिटाया जा सका। मीर क़ासिम को नवाब के पद से हटाकर एक बार पुनः मीर जाफ़र को अंग्रेज़ों ने बंगाल का नवाब बनाया। 5 फ़रवरी, 1765 ई. को मीर जाफ़र की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के बाद कम्पनी ने उसके अयोग्य पुत्र नजमुद्दौला को बंगाल का नवाब बनाकर फ़रवरी, 1765 ई. में उससे एक सन्धि कर ली। सन्धि की शर्तों के अनुसार रक्षा व्यवस्था, सेना, वित्तीय मामले, वाह्य सम्बन्धों पर नियंत्रण आदि को अंग्रेज़ों ने अपने अधिकार में कर लिया ।


प्लासी और बक्सर युद्ध की तुलना 

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बंगाल पर राजनीतिक नियंत्रण के क्रम में कंपनी को प्लासी एवं बक्सर के दो युद्धों का सामना करना पड़ा । वस्तुतः पूरे भारत में अंग्रेजी सम्राज्यवाद की स्थापना की दृष्टिकोण से दोनों युद्ध निर्णायक माने जाते है। जहाँ प्लासी के युद्ध ने ब्रिटिश कंपनी के विस्तार हेतु आवश्यक पृष्टभूमि तैयार किया वही बक्सर युद्ध ने कंपनी को भारतीय साम्राज्य का प्रधान दावेदार बना दिया। इस प्रकार दोनों युद्धों का ब्रिटिश सम्राज्यवाद के लिए महत्वपूर्ण स्थान है । लेकिन दोनों युद्धों की तुलना भी की जाती है । सैनिक दृष्टि से प्लासी की लड़ाई मात्र एक झड़प थी । यह एक षड्यंत्र का परिणाम था । जिसमे मीरजाफर ने नवाब को अंग्रेजों के हाथों बेच डाला था । लेकिन बक्सर का युद्ध सैनिक दृष्टिकोण से अधिक महत्वपूर्ण था । इस युद्ध में अंग्रेजों ने मीरकासिम, शुजाउद्दौला एवं शाह आलम के संयुक्त गठबंधन को पराजित किया था । इस युद्ध से यह स्पष्ट हो गया की आधुनिक सुसंगठित सेना एक अखंडित सेना को पराजित कर सकती है । प्लासी युद्ध का क्षेत्र एवं उद्धेश्य भी सीमित था । इसका एक मात्र उद्धेश्य कठपुतली नवाब को गद्दी पर बैठाना था । लेकिन बक्सर युद्ध का उद्धेश्य कही बड़ा था । इसका उद्धेश्य किसी भी प्रकार से एक शक्तिशाली नवाब की समस्त संभावना को समाप्त करना था । राजनीतिक दृष्टिकोण से प्लासी का युद्ध महत्वपूर्ण है । बंगाल पर नियंत्रण की शुरुआत यहीं से होती है, लेकिन बक्सर का युद्ध अधिक महत्वपूर्ण है । प्लासी युद्ध से बंगाल पर पूर्ण नियंत्रण नही हुआ था । अभी भी कोई योग्य शासक अंग्रेजों को चुनौती दे सकता था । जैसा की मीर कासिम ने किया नवाब और कंपनी के बीच सर्वोच्चता का समाधान नही किया गया था । लेकिन बक्सर युद्ध से यह समाधान हो गया और कंपनी सर्वोच्च हो गई । बंगाल पर योग्य नवाब की उभरने की संभावना समाप्त हो गई । बंगाल पर कंपनी को निजामत एवं दीवानी दोनो अधिकार प्राप्त हो गये । इसके अलावा अवध के नवाब अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया । इलाहाबाद तक का प्रदेश अंग्रेजों के चरणों में आ गया और अब कंपनी दिल्ली कर दस्तक देने की स्थिति में आ गई । आर्थिक दृष्टि से प्लासी का युद्ध महत्वपूर्ण साबित हुआ । कंपनी को कीमती धातुओं के आयात से मुक्ति मिली । कंपनी के अधिकारियों को बेपनाह दौलत का स्रोंत मिल गया । लेकिन बक्सर का युद्ध आर्थिक दृष्टिकोण से और अधिक महत्वपूर्ण साबित हुआ । द्वैध शासन के जरिये शोषण का एक नया युग समाप्त हुआ । कंपनी अब बंगाल से मिलने वाले भू-स्वराज को माल खरीदने में निवेश करने लगे । इस प्रकार संगठित धन निर्गमन शुरु हुआ । इस प्रकार ब्रिटिश समाजवाद के लिए दोनो युद्धों का महत्व है । लेकिन तुलनात्मक रुप से बक्सर का युद्ध अधिक निर्णायक है ।  लेकिन यह तथ्य उल्लेखनीय है कि दोनो युद्ध वस्तुतः एक ही सम्राज्यवाद के अंग थे । प्लासी युद्ध उपर्युक्त वातावरण का श्रीजन किया और बक्सर युद्ध ने सभी समस्याओं को सुलझाते हुए, प्लासी के अधूरे कार्य को पूर्ण किया । दोनों का सम्मिलित परिणाम था पहले बंगाल में एवं बाद में भारत में अंग्रेजी सम्राज्यवाद की स्थापना जिसने भारत में अंधकारमय काल और बर्बर शोषण की शुरुआत कर दी ।

                ( HISTORY)

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